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हरसिद्धि माता मंदिर

मां हरसिद्धि.....13 वां शक्तिपीठ, माता सती की यहां कोहनी गिरी थी

उज्जैन स्थित भव्य श्री हरसिद्धि मंदिर भारत के प्राची स्थानों में से एक है जो कि माता सती के 51 शक्तिपीठों में 13 वां शक्तिपीठ है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता सती के पिता दक्षराज ने विराट यज्ञ का भव्य आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवता व गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया। परंतु उन्होनें माता सती व भगवान शिवजी को नहीं बुलाया। फिर भी माता सती उस यज्ञ उत्सव में उपस्थित हुई। वहां माता सती ने देखा कि दक्षराज उनके पति देवाधिदेव महादेव का अपमान कर रहे थे। यह देख वे क्रोधित हो अग्निकुंड में कूद पड़ीं। यह जानकर शिव शंभू अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने माता सती का शव लेकर सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण शुरू कर दिया। शिवजी की ऐसी दशा देखकर सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मच गया। देवी-देवता व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और संकट के निवारण हेतु प्रार्थना करने लगे। तब शिवजी का सती के शव से मोहभंग करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया था। चक्र से माँ सती के शव के कई टुकड़े हो गए। उनमें से 13 वाँ टुकडा माँ सती की कोहनी के रूप में उज्जैन के इस स्थान पर गिरा। तब से माँ यहां हरसिद्धि मंदिर के रूप में स्थापित हुई।

इतिहास के पन्नों से यह ज्ञात होता है कि माँ हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी थी जिन्हें प्राचीन काल में ‘मांगलचाण्डिकी‘ के नाम से जाना जाता था। राजा विक्रमादित्य इन्हीं देवी की आराधना करते थे एवं उन्होंने ग्यारह बार अपने शीश को काटकर माँ के चरणों में समर्पित कर दिया पर आश्चर्यवाहिनी माँ पुनः उन्हें जीवित व स्वस्थ कर देती थी। यही राजा विक्रमादित्य उज्जैन के सम्राट थे, जो अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते थे। इन्हीं राजा विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत सन की शुरूआत हुई।

श्री हरसिद्धि मंदिर पूर्व मं महाकाल एवं पश्चिम में रामघाट के बीच में स्थित है। बारह मास भक्तों की भीड़ से भरा महाकाल वन उज्जैन का हरसिद्धि शक्तिपीठ ऊर्जा का बहुत बड़ा स्त्रोत माना जाता है। तंत्र साधकों के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है जो कि उज्जैन के आध्यात्मिक और पौराणिक इतिहास की कथाओं में वर्णित भी है।

नवरात्रि का त्यौहार यहां खूब धूम-धाम और आस्था के साथ मनाया जाता है। सैंकड़ों दीपक एकसाथ दीपमालिका में नवरात्रि के नौ दिन जलाये जाते है जिससे अद्भुत और दिव्य दृश्य का निर्माण होता है। हरसिद्धेश्वर उन सभी भक्तों और श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते है जो सच्ची आस्था के साथ इस मंदिर में आते है और श्री हरसिद्धेश्वर को अपनी श्रद्धा प्रकट करते हे।

श्री हरसिद्धि मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में श्री यंत्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है। शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसा लोगों का विश्वास है। मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है। प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है जिनके आकाश की और मुख किये हुए काले स्तम्भ प्रांगण के भीतर रहस्यमयी वैभव का वातावरण स्थापित करते है। यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन है। ज्योतिषियों के अनुसार इसका शक्तिपीठ नामकरण किया गया है। ये नामकरण इस प्रकार है - स्थान का नाम 13 उज्जैन, शक्ति का नाम मांगलचाण्डिकी और भैरव का नाम कपिलाम्बर है। इस प्राचीन मंदिर के केन्द्र में हल्दी और सिन्दूर की परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है जो कि लोगों कि आस्था का केन्द्र है।

हरसिद्धि मंदिर महाकाल के पास हरसिद्धि मार्ग पर स्थित है। यहां आने के लिए सिटी बस उपलब्ध है और लगभग सभी श्रद्धालु जो महाकाल दर्शन को आते है वे सभी यहां आकर अपनी मनोकामनाओं कि पूर्ति हेतु दर्शन लाभ लेते है एवं अपने तन तथा मन को शुद्ध करते है।